ऐसे समय में जब कोरोनावायरस महामारी ने पूरी दुनियां को अपने गिरफ्त में ले लिया है और इससे मरने वालों का आंकड़ा लाखों तक पहुंचने वाला है। जहां पर मानवजाति खुद को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है और वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ़ बढ़ी जा रही है, तब ऐसे दौर में दोनों सुपरपावर देश अपने अपने हित साधने में लगे हैं। एक तरफ जहां इस कोरोनावायरस ने चीन को, अमेरिका को परास्त कर अपनी बादशाहत कायम करने का मौका दे दिया है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका आज अपनी अर्थव्यवस्था के उस निचले मुकाम तक पहुंच चुका है, जहां से 4 साल पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अमेरिका फर्स्ट का नारा देकर आगे बढ़ाया था। इन परिस्थितियों में भी भू-राजनैतिक परिदृश्यों को बदलने के लिए पिछले हफ्ते राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सबसे पहले तो ईरान द्वारा अमेरिकी सैनिकों पर फिर से हमला करने की आशंका जताई, तत्पश्चात मौके का फायदा उठाते हुए रविवार को इराक़ के अमेरिकी मिलिट्री बेस में पेट्रोयट मिसाइल सिस्टम तैनात कर दिया। ट्रंप ने चेतावनी भी दी है कि अगर ईरान और उसके द्वारा पोषित किसी विद्रोही गुट ने अमेरिकी सैनिकों पर कोई छद्म हमला भी किया, तो उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। ईरान पर ये दबाव इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि 2020 में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव नज़दीक आते जा रहा है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के पास पिछले कार्यकाल में किए गए कार्यों को बताने को लेकर कोई ठोस उपलब्धि नहीं बची है, जिसे लेकर वे मतदाताओं को लुभा सकें। यकीनन उन्होंने अर्थव्यवस्था को ऐतिहासिक ऊंचाई तक पहुंचाया, बेरोज़गारी दर अमेरिकी इतिहास में सबसे कम स्तर पर लाए, कनाडा व मैक्सिको के साथ नाफ्टा को खत्म करके अधिक अमेरिकी हितों वाला यूएसएमसीए समझौता किया, चीन के साथ व्यापार युद्ध प्रारंभ करके खरबों डॉलर का मुनाफा कमाया और स्टील एवम् एल्युमिनियम पर टैरिफ लगाकर दुनियां को घुटनों पर ला दिया। एक वो भी दौर था जब अमेरिका सबसे बड़ा तेल आयतक देश था, लेकिन आज वह दुनियां का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश बन चुका है। ट्रंप ने अपने वादे के अनुसार सीरिया से सैनिकों को वापस बुला लिया, अफगानिस्तान से भी सैनिकों कि वापसी करीब है, ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाया, इसके बाद वो यूरोपियन यूनियन से व्यापार युद्ध प्रारंभ करने की दिशा में बढ़ रहे थे और भारत के साथ व्यापार समझौते के। लेकिन ऊपर मैंने जो कुछ भी बताया, कोरोनावायरस महामारी से वो सबकुछ सिर्फ एक ही झटके में तबाह हो गया।

अमेरिका ने पूरे व्यापार युद्ध में भी चीन से उतना पैसा नहीं कमाया जितना इस चाइनीज वायरस की वजह से अपने नागरिकों के लिए $2.2 ट्रिलियन का राहत पैकेज जारी में लग गया, अब तक 15000 मौतें जो हो चुकी हैं, वो अलग। इसीलिए राष्ट्रपति ट्रंप इस महामारी में लोगों को शांत करने और सबका ध्यान हटाने के लिए ईरान को फिर से दबाव में लाना चाहते हैं, ताकि वो एक नया ईरान न्यूक्लियर डील कर सकें, जो अमेरिकी हितों के अनुरूप हो, और जिसे ट्रंप अपनी उपलब्धि के रूप में अमेरिकी जनता के सामने रखकर फिर से चुनाव में जा सकें। ट्रंप को उम्मीद है कि उनका ये दांव ज़रूर कामयाब होगा क्योंकि प्रतिबंधों की वज़ह से ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है, और कोरोनावायरस ने ईरानी कैबिनेट के 27 सदस्यों के साथ 68000 नागरिकों को अपनी गिरफ्त में लेकर इस बची हुई अर्थव्यवस्था को भी पूरी तरह तोड़कर रख दिया है। चूंकि ईरान ने हाल ही में भारत से अपील की थी कि वह अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर मानवता के लिए स्वास्थ्य व चिकित्सा वस्तुएं मुहैया कराए, जैसा उसने चीन और इजरायल को मुहैया कराया, और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ब्राज़ील एवं सार्क देशों को कराने वाला है, लेकिन भारत ने उनकी इस अपील पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसके अलावा ईरान ने इस महामारी से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी $5 बिलियन का बेलआउट पैकेज मांगा है, लेकिन सभी जानते हैं कि बिना अमेरिकी सहमति के पैकेज मिलना संभव नहीं, इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप ने अधमरे ईरान को घेरकर दबाव में ला दिया है।
लेकिन फिलहाल ईरान ही नहीं, अमेरिका भी इसी दबाव का सामना कर रहा है क्योंकि अर्थव्यवस्था के अलावा मिलिट्री पॉवर ही है जो इसे दुनिया का बादशाह बनाती है, लेकिन हाल ही में कोरोनावायरस ने अमेरिकी नौसेना के भीतर प्रवेश कर इसके नौसैनिक नेतृत्व में संकट पैदा कर दिया है। विडंबना यह है कि परमाणु शक्ति से लैस शक्तिशाली निमिट्ज़ क्लास एयरक्राफ़्ट कैरियर यूएसएस थिओडोर रूज़वेल्ट कोरोनावायरस का शिकार हो गया। रफ राइडर कहे जाने वाले इस जहाज का आदर्श वाक्य है – जिसने पौधे लगाए हैं वह जीवित रहेगा। 117000 टन विस्थापन क्षमता वाले विशाल जहाज में 90 विमान तथा 5000 कर्मी आते हैं, जिसमें लगभग 100 से अधिक नाविकों के कोरोना से ग्रस्त हो जाने के कारण यह शक्तिशाली युद्धक जहाज इतना असहाय हो चुका है जितना पहले कभी नहीं रहा। यह जहाज चीन केंद्रित आक्रामक अभियान का नेतृत्व कर रहा था जिसपर संक्रमण का पहला मामला 24 मार्च को आया, लेकिन लापरवाही का आलम यह है कि संक्रमण तेजी से फैलने से पहले तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसी गुस्से व निराशा में जहाज़ के कैप्टन ब्रेट क्रोशिए ने नौसैनिक नेतृत्व को 4 पेज का कठोर पत्र लिख डाला, जिसमें उन्होंने निर्णायक कार्यवाही की मांग करते हुए मामले को लगातार लटकाने के खिलाफ चेतावनी देने के साथ इस लापरवाही को अस्वीकार्य बताया था। कैप्टन ने पत्र में लिखा कि हम युद्ध नहीं कर रहे हैं इसलिए हमारे नौसैनिकों को मरना नहीं चाहिए, और यदि हम फौरन कार्यवाही नहीं करते हैं तो हम अपनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण संपदा नौसैनिकों की देखभाल में विफल रहेंगे और यह समुद्रों के बादशाह कहे जाने वाले देश और उसकी गौरवपूर्ण नौसैनिक परंपरा की आत्मा पर चोट पहुंचाने वाला होगा। इसका निष्कर्ष यह हुआ कि परसों ही अमेरिकी नेवी के चीफ थॉमस मोडली को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन पर आरोप था कि उन्होंने उस अधिकारी पर कार्यवाही की है जो कोरोनावायरस से जूझ रहे अपने क्रू के साथियों के लिए मदद मुहैया कराने की गुहार कर रहा था।

इसी बीच ईरानी विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति पर पलटवार करते हुए बयान दिया है कि हमारे सिर्फ छद्म विद्रोही गुट ही नहीं हैं, जैसा कि अमेरिका दुनियां को बता रहा है, बल्कि इस मुसीबत की घड़ी में कुछ हमारे दोस्त भी हैं जो हमारी मदद के लिए हर पल तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अमेरिका पर कभी कोई हमला नहीं किया, बल्कि उसके झूठ, छल और हत्या का बदला हमारा आत्मरक्षा में उठाया गया कदम था। इस बयान से एक बात पूरी तरह साफ है कि ईरान ऐसी परिस्थिति में भी अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं है, और ना ही वह अपने परमाणु कार्यक्रम में कोई बदलाव लाने वाला है। मुझे लगता है कि इस महामारी ने ईरान को एक अवसर से दिया है जिससे वह मौके का फायदा उठाकर परमाणु संवर्धन के और नज़दीक पहुंच जाएगा। क्योंकि महामारी से निपटने में लगे देश फिलहाल खुद को ही बचाने में लगे हैं। ईरान की उस कोशिश में चीन भी अत्यधिक मदद करेगा, क्योंकि वो इस महामारी से लगभग बाहर आ चुका है और दुनियाभर को चिकित्सा व स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा रहा है जिसमें ईरान भी शामिल है। वास्तविक रूप से ईरानी विदेश मंत्री उस बयान में अपने इसी दोस्त चीन और उसकी मदद का ज़िक्र कर रहे थे, क्योंकि वर्तमान समय में चीन ही एकमात्र देश है जो अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए ईरान के साथ खुलेतौर पर व्यापार कर रहा है, और 40 वर्षों में ईरान के अंदर $400 बिलियन का निवेश करने वाला है। फिलहाल तो युद्ध की कोई गुंजाइश नहीं है लेकिन अगर युद्ध होता भी है तो सबसे ज्यादा परेशानी भारत, चीन, जापान और साउथ कोरिया जैसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पड़ेगा क्योंकि इससे क्रूड आयल में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो जाएगी, जो महामारी के दौर में वैश्विक अर्थव्यवस्था को और मंदी की ओर धकेल देगा। फिर भी हम देखेंगे कि राष्ट्रपति अपनी चुनावी कैंपेन से पहले कोरोनावायरस से देश को कैसे सुरक्षित बचाते हैं क्योंकि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले में जितने लोगों की मौत हुई थी अब तक उससे 5 गुना अधिक मौत अमेरिका में दर्ज हो चुकी है। और सबसे ज़्यादा संक्रमण भी अमेरिका ही झेल रहा है।
10 अप्रैल 2020
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