विश्व एक नए शीत युद्ध की ओर

भारत के चाणक्य नीति की तरह चीन के झोऊ राजवंश के फौजी जनरल सून-ज़ू ने छठवीं सदी में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द आर्ट ऑफ वॉर में यह बताया था कि किस तरह बिना लड़े ही दुश्मन को जंग में हराया जा सकता है, और आज कुछ इसी टैक्टिक्स का प्रयोग करते हुए चीनी सरकार ने ग्लोबल टाइम्स के जरिए भारत को धमकी देते हुए कही है- कि वह चीन और अमेरिका के बीच कोल्ड वॉर में अमेरिका का प्यादा ना बने, वरना भारत के पास पाने के लिए तो बहुत कम चीजें होंगी लेकिन वह खो बहुत कुछ देगा। देखा जाए तो 2020 की शुरुआत से ही दुनिया एक नए मोड़ पर पहुंच चुकी है, अब विश्व एक नए ध्रुवीकरण, नए सुपरपावर, नए वैश्वीकरण, नए आत्मनिर्भरता और शायद नए देशों के जन्म पर जाकर खत्म हो। यकीनन इसमें दशकों का वक़्त लगेगा और हथियारों की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ जाएगी, लेकिन अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध से शुरू होकर कोरोनावायरस के माध्यम से जो परिस्थितियां आज दुनिया झेल रही है उसमें जियोस्ट्रेटजी, जिओपॉलिटिक्स, एकाधिकारवाद, नवसम्राज्यवाद और वॉर टेक्टिक्स भी शामिल है। इसने दो महाशक्तियों को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है, एक तरफ अमेरिका है जिसने शक्तियों का प्रयोग करके कई देशों पर प्रतिबंध लगाए साथ ही कई अंतरराष्ट्रीय संधियों से खुद को बाहर भी कर लिया; तो दूसरी तरफ चीन है जिसने सिर्फ़ एक अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र जांच कराने के प्रस्ताव को अपनी अस्मिता से जोड़कर अपने पड़ोसियों पर आक्रामक राजनयिक व सैन्य उत्पीड़न करने में लगा है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि दोनों ही राष्ट्रप्रमुख इस हार-जीत में अपना चेहरा बचाने में लगे हुए हैं जिसके लिए इन्होंने राष्ट्रवाद और संप्रभुता को अपना हथियार बनाया है। समझने वाली बात यह है कि जब मामला कोरोनावायरस का था तो सैन्य गतिविधियां क्यों प्रारंभ हुई, और भारत, जापान, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे देश इन मामलों में कैसे फंस गए। इसके दो कारण है पहला यह कि वर्तमान में उपर्युक्त सभी देश अमेरिकी गुटों के करीब आ चुके हैं और दूसरा यह कि सभी देशों के चीन से सीमा विवाद हैं। लेकिन इस परिदृश्य में ताइवान, हांगकांग और तिब्बत के आजादी की मांग भी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। चूंकि इसमें किसी को शक नहीं कि चीन एक मजबूत देश है और वह एक सुपरपॉवर के रूप में उभर रहा था, लेकिन कोरोना महामारी ने उसकी साख को तगड़ा झटका दिया है। हालांकि इससे दुनिया का कोई भी देश फायदे में नहीं है लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान और खामियाजा अगर किसी को भुगतना पड़ रहा है तो वह चीन है।

फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि दुनिया महामारी का समाधान ढूंढने की जगह शीत युद्ध की ओर क्यों बढ़ चली है, तो इसका कारण है चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वकांक्षा। एक वह भी दौर था जब 1949 में चीन को कोई मान्यता तक नहीं दे रहा था, उस समय माओत्से-तुंग तो राष्ट्रध्यक्ष के रूप में सशस्त्र क्रांति के साथ चीनी सत्ता को संभालने में लगे रहे लेकिन दूसरे देशों से राजनयिक संबंध स्थापित करने, 1950 में तिब्बत को कब्जाए जाने के बाद प्रतिबंधों से बचने, 1972 में संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने से लेकर सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता पाने के पीछे जो नीतियां थीं, उसके नीतिनिर्माता थे प्रधानमंत्री झोउ-एनलाई। जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर पूरी विदेश नीति संभाली और चीन को अकेला होने से बचाया। इस परंपरा को सत्तर के दशक में सांस्कृतिक क्रांति लाने वाले चीनी राष्ट्रपति डेंग-शियाओ-पिंग ने भी नहीं बदली जिनके राज में चीन साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर मुड़ गया था। लेकिन जब से शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति की कमान संभाली है तब से उन नीतियों में अप्रत्याशित उलटफेर किया है, उन्होंने जीवनपर्यंत सत्ता चलाने के लिए खुद को संविधान में भी सम्मिलित करा दिया है अब सारा खेल इसी शी डॉक्ट्रिन का है। क्योंकि चीन को महाशक्ति बनाने के लिए शी ने जो 10 महान सपने बनाएं हैं अब उनमें दरारें आने लगी हैं। चीन के नजरिए से देखें तो दुनियाभर में खराब होती आर्थिक सेहत की वजह से वह राष्ट्र पति शी जिनपिंग के सपने को पूरा करने पर फोकस नहीं कर पा रहा है। जबकि यही एक पार्टी के शासन वाले चीन में शी जिनपिंग की वैधानिकता का एकमात्र स्रोत है। इसलिए शी के सपने को पूरा करने की बजाय अब चीन राष्ट्र वाद और संप्रुभता जैसे मुद्दों को हवा दे रहा है, और चीन के रुख में यह बदलाव अमेरिका के बढ़ती उसकी प्रतिद्वंद्विता की वजह से आया है।

चीन अबतक 595 बिलियन डॉलर बेल्ट एंड रोड परियोजना में ख़र्च कर चुका है और कोरोनावायरस पर जानकारी छुपाने के लिए ट्रिलियन डॉलर्स की जो परियोजनाएं रद्द हुईं, वो अलग। हाल ही में इस्राएल द्वारा 5 बिलियन डॉलर का डिसेलिनेशन प्रोजेक्ट और ऑस्ट्रेलिया द्वारा 3 बिलियन डॉलर का विनार्मण प्रोजेक्ट रद्द कर देना इसी में शामिल है। ये सारे नतीजे चीन को डराने वाले हैं इसमें सबसे बड़ा झटका तो अफ्रीकन देशों ने दिया है। इतना सब होने के बाद भी शी जिनपिंग ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को अधूरा नहीं छोड़ा है इसलिए वे सभी चीजों से ध्यान भटकाने और अपने चेहरे को बचाने के लिए पूरे देश में संप्रभुता और राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं ताकि उनके प्रतिद्वंदी और चीनी जनता में कोई आक्रोश उत्पन्न ना हो। उन्होंने सबसे पहले ताइवान के प्रतास द्वीपसमूह को सैन्य कार्यवाही से चीन में मिलाने की योजना पर काम किया, तत्पश्चात हांगकांग में सुरक्षा कानून लागू कर एक देश – दो विधान की नीति को रौंदते हुए उसकी स्वायत्तता खत्म कर दी। तिब्बत की भी स्वायत्तता खत्म करने के लिए चीन वहां अलगाववादी प्रोपेगेंडा चला रहा है। जब इतने से कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने भारत के साथ सिक्किम और लद्दाख में सीमा विवाद शुरू करके उसे दबाव में लाना प्रारंभ किया। चीन भले ही भारतीय सीमा पर स्थिति को स्थिर और नियंत्रण योग्यस बता रहा हो लेकिन यह पिछले कई सालों में दोनों देशों के बीच सबसे बड़े सैन्यो जमावडे़ में से एक है। वास्तविक रूप में देखें तो यह उस बात की खीझ है, जिसके तहत भारत ने चीन से आने वाले एफडीआई और एफपीआई पर रोक लगा दी है। चीन इस बात से भी चिढ़ा हुआ है कि भारत अमेरिका के साथ रिश्तेा मजबूत करने के साथ उसके सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रीक्‍चर प्रॉजेक्ट  बीआरआई का विरोध कर रहा है और दलाई लामा को शरण भी दी है, इसलिए सभी पड़ोसियों धमकाकर चीनी राष्ट्रपति देश की नजरों में हीरो बनने की कोशिश कर रहे हैं। इतने में ही महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हुई तो शी यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि अपने देश में कोरोनावायरस को पूरी तरह रोकने के लिए दुनिया सज़ा देने की जगह उनकी तारीफ़ करे।

अब जब इतना सब कुछ हो रहा है तो प्रत्युत्तर आना निश्चित था। एकतरफ अमेरिकी कांग्रेस में तिब्बत को स्वतंत्र देश घोषित करने संबंधी प्रस्ताव तो दूसरी ओर वन चाइना पॉलिसी को किनारे रखकर ताइवान को संप्रभु देश के रूप में मान्यता देने की कोशिश, तीसरी तरफ हांगकांग की व्यापार संबंधी स्पेशल स्टेटस को खत्म करते हुए अधिकारियों पर प्रतिबंध, और अंत में अमेरिका को डब्ल्यूएचओ से बाहर निकालने के ट्रंप के फैसले ने दुनियाभर को चौका दिया है। जल्द ही अमेरिका कंप्रिहेंसिव न्यूक्लियर टेस्ट बन ट्रीटी से भी अलग होने जा रहा है ताकि 1992 के बाद फिर से परमाणु परीक्षण करके अपना सामर्थ्य दुनिया को दिखा सके। लेकिन यह सब यहीं नहीं रुकने वाला है अमेरिका चीन को रोकने के लिए जी7 समूह का विस्तार करना चाहता है, जिसमें भारत भी शामिल किया जा सके। इसके अलावा ब्रिटेन भी एक डी10 यानी डेमोक्रेसी 10 समूह बनाने का प्रस्ताव लाया है इसमें भी भारत को शामिल किए जाने की वकालत की गई है, जिसका उद्देश्य चीन की 5जी टेक्नोलॉजी को रोकना है। इधर भारत चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना को काउंटर करने के लिए वन सन-वन वर्ल्ड-वन ग्रिड की कार्ययोजना पर विचार कर रहा है जिसके तहत इंटरनेशनल सोलर एलाइंस से जुड़े सभी देशों को एक पॉवर ग्रिड से जोड़ा जा सके, जिसका प्रमुख लाभार्थी अफ्रीका महाद्वीप होगा। हाल ही में ऑस्ट्रलिया के साथ कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और नेवल लॉजिस्टिक पैक्ट की घोषणा भी महत्वपूर्ण कदम है, जिसके तहत चीन को रोकने के लिए भारत कोकोस द्वीपसमूह का इस्तेमाल कर सकेगा। क्वॉड और जय समूह के द्वारा भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही चीन की घेराबंदी में लगे हुए हैं। इसलिए मेरा सुझाव है कि शी जिनपिंग को अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए वरना उन्हें अर्थव्यवस्था के अलावा सामरिक हितों से भी नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि अगर उन्होंने लद्दाख से अपनी सेनाओं को वापस हटाया तो चीन में ही उनके प्रति नकारात्मकता फैलेगी, जिससे उनके सत्ता परिवर्तन का अवसर बढ़ जाएगा, और अगर उन्होंने सेना नहीं हटाई तो यकीनन भारत सभी समूहों से जुड़ते हुए अमेरिका के और करीब चला जाएगा, इसलिए शी जिनपिंग अब फंस चुके हैं और दुनिया एक नए कोल्ड वॉर की ओर मुड़ चुकी है। हालांकि इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि कोरोनावायरस और नस्लीय हिंसा ने न सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप बल्कि अमेरिका की जड़ें भी हिला कर रख दी हैं। बहरहाल हम देखेंगे कि यह छद्म विवाद कितनी दूर तक जायेगा।

06 जून 2020

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