भारत के बहुत कम नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी जैसा प्रभाव जमाया है। 2014 और 2019 की उनकी जीत ने भारत को तीन दशकों में सबसे निर्णायक जनादेश दिया, और 1984 के बाद यह पहली बार था जब किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। हाल ही में उन्होंने शासन में लगातार 25 वर्षों की जनसेवा पूरी की है। जवाहरलाल नेहरू के बाद, कोई अन्य भारतीय नेता इतने लंबे समय तक सरकार का नेतृत्व नहीं कर पाया है। अब निर्णायक सरकार ही उनकी पहचान बन गई है, और एक दशक तक यह सच भी रही। लेकिन उनका तीसरा कार्यकाल अलग है। भाजपा की मात्र 240 सीटों ने एक मजबूत जनादेश को गठबंधन पर निर्भर जनादेश में बदल दिया है। इसमें सत्ता-विरोधी लहर साफ दिख रही है, विपक्ष भी छोटे से छोटे मुद्दों पर एकजुट हो गया है, और निर्णायक सरकार की छवि के सामने अब 2014 के बाद की यही सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है।
दूसरी गंभीर चुनौती संस्थागत स्तर पर है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं, और लाखों मतदाता इसके खिलाफ अपील कर रहे हैं। विपक्ष इसे “वोट चोरी” का आरोप लगाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है। इसी बीच चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरों ने इन आरोपों को और हवा दे दी है। इसलिए विपक्ष की मांग अब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तक पहुंच गई है, जिन पर आरोप है कि वे चुनाव आयुक्तों को बचा रहे हैं और अपनी सरकार वोट चोरी से बनायी है। बहरहाल, कोई भी लोकतंत्र ऐसे रेफरी के भरोसे नहीं चल सकता, जिस पर खिलाड़ियों को ही भरोसा न हो। और हम तो वैसे भी मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी हैं । इसलिए कहा जा सकता है, कि सरकार के लिए सबसे अच्छा जवाब पारदर्शिता है, न कि बैरिकेड्स लगाना या भारी पुलिस बल तैनात करना। खामोश रहकर विश्वसनीयता नहीं बचाई जा सकती।
तीसरी चुनौती अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर है । सरकार ने अप्रैल-जून तिमाही के लिए 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर्ज की है, लेकिन पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इसपर सवाल खड़ा कर दिया है। उनका तर्क है कि पिछले साल के बेस आधार को नीचे की ओर संशोधित करने से इस साल के आंकड़े बेहतर दिख रहे हैं, जबकि वास्तविक वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत के ही करीब है। पशोपेश में सरकार कह रही है कि उनकी तुलना सांख्यिकीय रूप से गलत है, क्योंकि इसमें दो अलग-अलग डेटा सीरीज को मिला दिया गया है। आंकड़ों के मामले में चाहे जो भी सही हो, पर यह बहस खुद दिखाती है कि सरकारी आंकड़ों पर जनता का भरोसा कम हो रहा है। साथ ही, ज़मीनी हकीकत इस सवाल को और गहरा कर देती है, कि अगर अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, तो रुपया डॉलर के मुकाबले क्यों गिर गया है? विदेशी निवेशकों ने इस साल शेयर बाज़ार से लगभग 3 ट्रिलियन रुपये क्यों निकाल लिए हैं, जो कि एक रिकॉर्ड है? और 2026 में सेंसेक्स लगभग 15 प्रतिशत नीचे क्यों है? ऐसी विकास दर, जो मुद्रा, बाज़ारों और घरेलू बजट पर दबाव डालती हो, उसे साबित करने की ज़रूरत है; इसे कोई तय हकीकत नहीं माना जा सकता। महंगाई इस दबाव को और बढ़ा रही है। साथ ही आरबीआई भी ने रेपो रेट बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बढ़ोतरी थी । एसबीआई रिसर्च ने चेतावनी दी है कि रेपो रेट 6 प्रतिशत की ओर बढ़ सकता है। अर्थात जब कोई केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है और बढ़ती कीमतों के दबाव को लेकर चेतावनी देता है, तो इसका सीधा मतलब है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति आरामदायक नहीं है।
चौथी, राजनीतिक मोर्चे पर, राहुल गांधी इस चुनौती का सबसे अहम चेहरा बन गए हैं। विपक्ष के नेता के तौर पर, उन्होंने संसद से लेकर सड़कों और ऑनलाइन मंचों तक, अपनी आक्रामकता से सरकार को बैकफुट पर ला दिया है। युवा मतदाता, स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स शिक्षा, रोज़गार, महंगाई, और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उनके सवालों को और ज़ोर-शोर से उठा रहे हैं। युवा नेताओं की एक नई पीढ़ी ऑनलाइन दिखने वाले गुस्से को ज़मीनी विरोध-प्रदर्शनों में बदल रही है। कई सालों में पहली बार, सरकार के सामने एक ऐसा विपक्ष है जो पूरी ताक़त के साथ आगे बढ़ रहा है और जिसकी ज़मीनी मौजूदगी भी है। मज़बूत नेता की छवि पर टिकी सरकार के लिए, हर तरफ से राजनीतिक रूप से घिर जाना एक बिल्कुल नया अनुभव है। दूसरी तरफ, गठबंधन भी अब सरकार के कामकाज के दायरे को सीमित कर रहा है। बिहार में, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण के भीतर आरक्षण को लेकर अपने ही गठबंधन के सहयोगी जीतन राम मांझी और उनके बेटे से इस्तीफे की मांग कर दी। पासवान का कहना है कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है, न कि कोई खैरात । उधर उत्तर प्रदेश में, मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि जाति जनगणना के बाद राज्य को चार हिस्सों में बांट दिया जाएगा। हालांकि, किसी भी आधिकारिक प्रक्रिया में इस दावे का कोई आधार नहीं है, लेकिन ऐसी घटनाएं देश को याद दिलाती हैं कि सरकार का अपने गठबंधन पर अब वैसा नियंत्रण नहीं रहा, जैसा कभी अपनी पार्टी के भीतर हुआ करता था। दरअसल, यहीं से सरकार की ‘निर्णायक’ छवि धुंधली पड़ने लगती है। ‘निर्णायक होना’ हमेशा से मोदी ब्रांड की पहचान रही है। लेकिन तीसरे कार्यकाल में, कैबिनेट फेरबदल में देरी, परिसीमन विधेयक पर विवाद और लंबे समय से लंबित नीतिगत फैसलों ने विपक्ष को हमला करने का एक नया मौका दे दिया है। कई नीतिगत मामलों में सरकार अब हिचकिचाने लगी है, और हर बड़ा कदम उठाने से पहले उसे अपने सहयोगियों, विरोधियों और जनता के साथ मोलभाव करना पड़ रहा है। यानी एक दशक में सरकार ने जो छवि बनाई थी, वह अब कमज़ोर पड़ गई है।
पांचवा, विदेशी संबंधों में भी दबाव अब कम नहीं है। नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ रिश्ते ठंडे पड़ गए हैं, और पाकिस्तान का रुख अभी भी शत्रुतापूर्ण है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के बाद, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति और मज़बूत हुई है। पाकिस्तान का तुर्किये और सऊदी अरब के साथ अब एक रक्षा समझौता है। इसके अलावा, पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान ने तुर्की, कतर और इंडोनेशिया के साथ ‘बद्र समझौता ज्ञापन’ पर हस्ताक्षर किया है, जिसका उद्देश्य हथियारों का संयुक्त उत्पादन, साझा तकनीक और रक्षा निर्माण में सहयोग करना है । इन कोशिशों से पाकिस्तान को कई नए सहयोगी मिले हैं, तकनीक तक पहुंच मिली है और एक बड़ा कूटनीतिक मंच मिला है, जबकि भारत को लगता था कि उसने पाकिस्तान के इन विकल्पों को सीमित कर दिया है। पड़ोसी देशों के अलावा, अन्य क्षेत्रों में भी भारत के लिए रणनीतिक जगह कम हुई है । चीन का आक्रामक रुख भारत की सीमाओं और बाज़ारों पर दबाव डाल रहा है। अमेरिका के टैरिफ और प्रतिबंधों का दबाव व्यापार और वाशिंगटन के साथ हमारे संबंधों को जटिल बना रहा है। पश्चिमी देशों में बार-बार यह आलोचना उठ रही हैं कि भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद से यूक्रेन युद्ध को वित्त पोषित कर रहा है। मध्य पूर्व में अस्थिरता ऊर्जा आपूर्ति और वहां रहने-काम करने वाले लाखों भारतीयों के लिए अलग खतरा बनी हुई है। ग्लोबल साउथ, जिसे भारत ने एक नेता के रूप में लुभाने की कोशिश की थी, वह भी अब सतर्क हो रहा है। दरअसल, बहुसंबद्धता तभी कारगर होती है जब किसी देश की जरूरत सभी को हो। और यह तब विफल हो जाती है, जब साझेदार यह महसूस करने लगते हैं कि वे भारत के शांत होने का इंतजार कर सकते हैं।
ये सभी चुनौतियाँ मिलकर एक ऐसे सिद्धांत का वर्णन करते हैं जो एक अलग राजनीतिक दौर के लिए बनाया गया था, एक ऐसा दौर जिसमें भारी बहुमत, एक लचीला गठबंधन और एक कमजोर विपक्ष था। पर अब वह दौर बीत चुका है। और इसका सरल समाधान एक नई सरकार का गठन है जो भारत की संस्थाओं की स्वतंत्रता को बहाल करे, अपनी अर्थव्यवस्था की ईमानदारी से रिपोर्ट करे, अपने पड़ोस के साथ संबंधों को सुधारे और उस रणनीतिक स्वायत्तता का पुनर्निर्माण करे जिसकी रक्षा पिछली पीढ़ियों ने की थी। भारत को रोजगार, कीमतों और विदेश मामलों पर निर्णायक नीति की आवश्यकता है, न कि निर्णायक एवं धार्मिक नारों की, और उसे ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो देश का विश्वास फिर से जीत सके। मोदी के 25 साल के कार्यकाल को निश्चित ही मान्यता मिलनी चाहिए। लेकिन किसी नेता की विरासत का मूल्यांकन इस बात से होता है कि जब जनादेश कमज़ोर पड़ जाता है तो वह क्या और कैसी प्रतिक्रिया करता है, और निष्कर्ष यही है कि आज यह मोदी सिद्धांत दबाव में है।
डॉ. कुमार रमेश
उप–कुलसचिव, विदेशी मामलों के जानकार, एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर
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