एक समय था जब श्रीलंका के सभी राष्ट्रपति अपनी पहली विदेश यात्रा में भारत ही आया करते थे लेकिन आज के बदले हुए परिदृश्य में श्रीलंका की जगह भारत के प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्रा में श्रीलंका जाने लगे हैं, यह कूटनीति पिछले 10 सालों में बदली है जब से श्रीलंका में लिट्टे का खात्मा हुआ है। क्योंकि आज के नए राष्ट्रपति उस दौरान अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के सरकार में देश के रक्षा मंत्री हुआ करते थे। और उसके बाद से ही श्रीलंका की विदेश नीति में भारत की अहमियत कम हो गई, क्योंकि लिट्टे को खत्म करने के लिए जब गोताबाया राजपक्षे ने अपने भाई से हथियारों कि मांग की थी तब महिंदा राजपक्षे ने सबसे पहली मदद भारत से ही मांगी, लेकिन तत्कालीन यूपीए की गठबंधन सरकार ने डीएमके पार्टी के विरोध के कारण हथियार देने से मना कर दिया। अन्ततः राष्ट्रपति महिंदा ने चीन और पाकिस्तान से मदद मांगी और उन्होंने श्रीलंका को पूरा सहयोग दिया। इस तरह राजपक्षे परिवार भारत विरोधी व चीन का करीबी हो गया और इसी विरोध का फायदा उठाकर चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट रोड परियोजना के तहत हिन्द महासागर में पैठ बनाने के लिए श्रीलंका, मालदीव जैसे छोटे देशों को अपने कर्ज़ ज़ाल कूटनीति में फंसना प्रारंभ किया और विकास के नाम पर सिर्फ राजपक्षे सरकार के दौरान ही 3 बिलियन डॉलर से ज़्यादा कर्ज़ दे दिया लेकिन कर्ज़ ना चुका पाने के कारण अन्ततः श्रीलंका को अपना सामरिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण हम्बनटोटा बंदरगाह 99 वर्षों के लिए चीन को लीज पर दे देना पड़ा, साथ ही साथ कोलंबो बंदरगाह को भी विकसित करने की जिम्मेदारी चीन को ही मिली। यह निर्णय भारत और इसके भविष्य के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात बन गई।

अब यहीं से भारत ने श्रीलंका को सबक सिखाने के लिए उसे घेरना प्रारंभ किया। दोनों ही देश तत्काल पड़ोसी होने के अलावा सार्क और बिम्सटेक समूह के सदस्य भी हैं, दोनों के बीच 2005 से भारत-श्रीलंका मुक्त व्यापार समझौता लागू है, भारत ने ही श्रीलंका की ऊर्जा ज़रूरत को पूरा करने के लिए उससे पहला सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन समझौता भी किया, भारत श्रीलंका के छात्रों को छात्रवृत्ति दे रहा साथ ही श्रीलंका की टूरिज्म में अपना योगदान देकर उन्हें मजबूत कर रहा क्योंकि आज वहां हर पांचवां टूरिस्ट भारतीय है। लेकिन चीन को ओर झुकता देखकर गुस्सैल भारत ने श्रीलंका के चुनाव में राजपक्षे परिवार को सत्ता से हटाने के लिए हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया और अपनी खुफिया एजेंसी रॉ की मदद से राजपक्षे को हराकर भारत की ओर झुकाव रखने वाले मैत्रीपाला सिरिसेना को राष्ट्रपति बनवाया इसके बाद भारतीय प्रधानमंत्री भी श्रीलंका की यात्रा पर गए लेकिन एक ही वर्षों में सिरिसेना भी चीन के ज़्यादा करीब हो गए और भारत की चिंता जस की तस रह गईं। तब भारत ने रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनवाकर अपनी हितों कि रक्षा करना प्रारंभ किया, जिसका फायदा भारत को यह हुआ कि हम्बनटोटा बंदरगाह में चीन का शेयर घाटा दिया गया, साथ ही सैन्य गतिविधि करने की रोक लगा दी गई। इसके अलावा चीन को रोकने के लिए भारत ने भी हम्बनटोटा बंदरगाह से कुछ ही किलोमीटर दूर हम्बनटोटा हवाईअड्डे को लीज पर ले लिया और जापान के साथ मिलकर चीन द्वारा विकसित कोलंबो बंदरगाह के एक भाग ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल को अब भारत और विकसित कर रहा है। इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह रहा कि भारत की चिंता को देखते हुए श्रीलंका ने खुद का अपना नौसेना बेस को गाले से हम्बनटोटा में ही शिफ्ट कर लिया। इस तरह अनेकों मोर्चों पर भारत अब चीन से सीधे टक्कर ले रहा है साथ ही अब इसमें भारत ने चीन के एक और प्रतिद्वंदी जापान को भी शामिल कर लिया है।
लेकिन उसके बाद एक विचित्र घटना हुई जहां से श्रीलंका में नए राष्ट्रवाद की शुरुआत हुई। राष्ट्रपति सिरिसेना ने एक बयान जारी कर पूरे देश में तहलका मचा दिया कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ उनकी हत्या करना चाहती है। ये सुनकर श्रीलंकावासी अत्यधिक क्रोधित हो गए जिसका फायदा उठाया राजपक्षे परिवार ने। हालांकि तब प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने इस बयान को झूठा बताकर बात को रफा दफा कर दिया लेकिन श्रीलंकावासियों को हर जगह भारत का दखल देना पसंद नहीं आया। इसी बीच न्यूजीलैंड के मस्जिद में हुए गोलाबारी का जवाब मुस्लिम समूहों द्वारा श्रीलंका के चर्च में आत्मघाती हमले करके दिया गया। इस घटना ने पूरे श्रीलंका को इस तरह झकझोर दिया कि उन्हें लगने लगा, श्रीलंका को बचाना है तो आतंकवाद के खिलाफ तानाशाह और क्रूर राजपक्षे परिवार को ही सरकार में वापस लाना होगा।

यहीं से नए समीकरण का उदय हुआ। नरेंद्र मोदी दुबारा चुनाव जीतकर आए तो पहली यात्रा में मालदीव के साथ श्रीलंका चल दिये ताकि भारत के खिलाफ बने माहौल को पाट सकें। उन्होंने जहाज फेरी की शुरुआत की, जो राजधानी कोलंबो तक जाया करेगी। दोनों देशों ने भारत – श्रीलंका नॉलेज इनिशिएटिव भी प्रारंभ करने पर सहमति जताई और जल्द ही दोनों देश व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते पर भी हस्ताक्षर करेंगे, इसके साथ ही भारत ने श्रीलंका के त्रिंकोमाली बंदरगाह को भी विकसित करने की मांग की। लेकिन अब श्रीलंकावासियों के डर का फायदा उठाकर, तमिलों और मुस्लिमों से सुरक्षा का भरोसा दिलाकर, चीन से हम्बनटोटा बंदरगाह वापस लेने का वादा कहकर चीन कि ओर झुकाव रखने वाले राजपक्षे परिवार फिर से सत्ता में वापस आ चुके हैं जिसके बाद बिना देरी किए सबसे पहले भारतीय विदेशमंत्री एस जयशंकर प्रधानमंत्री मोदी का पत्र लेकर श्रीलंका पहुंच गए और उन्हें पहली विदेश यात्रा के लिए भारत आने का न्योता दिया। जिसे उन्होंने इस बयान के साथ स्वीकार किया कि हम्बनटोटा बंदरगाह में चीन के लीज की समीक्षा की जाएगी। लेकिन माना जा रहा है कि उन्होंने भारत नहीं अमेरिका के दबाव में ये न्योता स्वीकारा क्योंकि गोटाबाया पहले अमेरिकी नागरिक थे, और उनकी छवि नागरिकता त्याग देने के बाद भी इससे नहीं उबरी है और अमेरिका भी मानवाधिकारों के उल्लंघन को भुलाकर श्रीलंका को चीन से बचने में लगा है इसलिए उन्होंने भारत को ही चुना।
बहरहाल, भारत में उनका बहुत ही गर्मजोशी से स्वागत देखकर श्रीलंकावासी खुश होंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी को आगे रखकर श्रीलंका के विकास को अपनी प्राथमिकता बताया, साथ ही ये भी कहा कि यह सिर्फ श्रीलंका ही नहीं पूरे हिन्द महासागर के लिए ज़रूरी है। इसके लिए भारत ने श्रीलंका को 450 मिलियन डॉलर का लाइन ऑफ क्रेडिट कर्ज विकास के लिए मुहैया कराया है ताकि हमारे रिश्तों ने गर्मजोशी बनी रहे। इसमें 100 मिलियन डॉलर सोलर एनर्जी और 50 मिलियन डॉलर आतंकवाद से लड़ने के लिए होंगे। लेकिन आगे देखना होगा कि श्रीलंका की सरकार भारतीय हितों का किस कदर ध्यान रखती है, क्योंकि हमारे रिश्तों में थोड़ी सी भी दरार का फायदा चीन को होगा एवं नुकसान सार्क और हिन्द महासागर क्षेत्र को। क्योंकि सरकार और कूटनीति की अलावा और भी बहुत कुछ है, जिसे हमें संभालना ज़रूरी है। और वो है कच्चातिवु द्वीप का विवाद, पाक जलसन्धि और मन्नार की खाड़ी का जल क्षेत्र और प्रयोग संबंधी विवाद, मछुआरों का विवाद। लेकिन यह सब परस्पर सहयोग से ही होगा क्योंकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।
01 दिसंबर 2019
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