चीन के आगे सरेंडर मोदी सरकार!!

यह ज़रूरी नहीं कि कोई देश सैन्य मामलों में हार जाए तो ही उसे आत्मसमर्पण कहा जाएगा। आज की दुनिया ग्लोबलाइजेशन और अर्थव्यवस्था पर आधारित है और किसी देश के सुपरपावर बनने का तात्पर्य है कि वह सिर्फ सैन्य मामले में ही नहीं बल्कि आर्थिक, कूटनीतिक, सामरिक मामलों के साथ अंतरिक्ष एवं साइबर क्षेत्र में भी विश्व के किसी भी देश पर अपनी क्षमता से दबाव कायम कर सकता है। इसलिए यह शीर्षक महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि 1962 से 43000वर्ग किमी क्षेत्र खो देने के बाद भी हमारी सरकारें ऐसी घटनाओं से कोई सीख क्यूं नहीं लेती! हमारी प्रगतिशील और लोकतांत्रिक सरकारों को यह पता है कि चीन की नीति हमेशा से विस्तारवाद की रही है क्योंकि यह परंपरा उनके राजवंशों से चली आ रही है इसलिए हमारी सीमा में घुसपैठ कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन उसी भाषा में प्रतिउत्तर देने की जगह हमारी सरकारें चीन को खुश और शांत क्यों रखती आयी हैं? शुरुआत यकीनन 1962 के भारत-चीन युद्ध से होती है क्योंकि यह हमसे प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी है, लेकिन कुछ घटनाक्रम इससे पहले भी हुए थे जिसमें भारत ने अपीज़मेंट पॉलिसी को ही महत्व दिया। पहली घटना चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के संदर्भ में थी जिसमें भारत ने कोई जवाबी प्रतिक्रिया नहीं दी। दूसरी घटना अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा भारत को परमाणु बम देने संबंधी पेशकश थी, जिससे चीन को परमाणु परीक्षण करने से रोका जा सके, लेकिन उदारवादी पं. जवाहरलाल नेहरू ने विश्व शांति के लिए खतरा मानते हुए इस सहयोग को ठुकरा दिया। तीसरी गलती 1962 के युद्ध में भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल न करने की थी, क्योंकि भारत को डर था कि चीन को ज्यादा गुस्सा नहीं दिलाया जाना चाहिए अन्यथा वे अपनी वायुसेना से कोलकाता पोर्ट और अन्य शहरों को नष्ट कर देंगे। इन्हीं गलतियों ने चीन के प्रति भारत की जो नीति विकसित कर दी उसे आज भी सरकारें फॉलो कर रही हैं।

इसी कड़ी में एक बड़ी गलती 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी की, जब उन्होंने तिब्बत पर चीनी कब्जे को आधिकारिक मान्यता देकर उसे चीन का भाग मान लिया। दरअसल, मान्यता तो 1954 के पंचशील समझौते के आधार पर पं. नेहरु ने भी दी थी लेकिन उसमें अविभाजित तिब्बत का अस्तित्व था। जबकि बाद के वर्षों में चीन ने तिब्बत को 5 टुकड़ों में बांटकर उसके चार टुकड़ों यानी किंघाई, गांसू, युन्नान एवं शिचुआन को अपने मेनलैंड चीन में मिला लिया और उसके सिर्फ एक ही भाग को स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र में बदल दिया था, इस तरह बाकी चार क्षेत्रों को भुला दिया गया। आज के परिदृश्य में भी कुछ नहीं बदला है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछली कई सरकारों से भी बड़ा ब्लंडर करते हुए चीन के सामने हथियार डाल दिए है। दरअसल, चीन के मामले में पूर्ववर्ती सरकारों ने जो अपीज़मेंट पॉलिसी बनाई थी, उसका मकसद था चीन को शांत और खुश रखते हुए भारत का विकास। वे नीति निर्माता समझते थे कि चीन के विकास में भारत का विकास भी संभव है लेकिन चीन का मजबूत होना भारत की सुरक्षा दृष्टि से ठीक नहीं, इसलिए पूर्ववर्ती सरकारों ने चीन को रोकने के लिए जो विभिन्न नीतियां बनाई थीं, प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आते ही इसे उलट-पुलट कर दिया और देश चीनी निर्भरता के आगे दम तोड़ने लगा।

चूंकि भारत की चीन सामानों पर निर्भरता 21वीं सदी की शुरुआत से बढ़ने लगी थी, जिसमें हमारा व्यापार घाटा भी तेजी से बढ़ रहा था। उसी समय कुछ नीति निर्माताओं ने सरकार को सुझाव दिया कि चीनी निवेश को भारतीय बाजार विशेषकर टेलीकम्युनिकेशन और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में अनुमति देकर व्यापार घाटे की पूर्ति की जा सकती है, लेकिन पिछली सरकारों ने डर से इस सुझाव पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई ताकि चीनी निवेश बची हुई भारतीय कंपनियों को भी पंगु ना बना दें। अब यहीं से पूरा घटनाक्रम बदला, जैसे ही नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने उन्होंने एफडीआई और चीनी निवेश के दरवाजे खोल दिए। तथ्यों को इस तरह समझिए कि उसी समय फिनलैंड की कंपनी नोकिया कारोबार समेटकर भारतीय बाजार को अलविदा कह रही थी तब दूसरी तरफ बिना किसी अन्तराल के जियोनी, लेनोवो, ओप्पो, वीवो जैसी चीनी कंपनियों ने नोकिया के रिक्त स्थानों की पूर्ति करने भारत आ रही थीं। परिणाम यह है कि 2014 में सिर्फ 2 स्मार्टफ़ोन प्लांट वाला भारत, आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफ़ोन उत्पादक है लेकिन टॉप 100 में 1-2 के अलावा कोई भी भारतीय कंपनी शामिल नहीं। उधर चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा भी 2014 के बाद से आज दुगना बढ़ गया। रही बात चीनी इन्वेस्टमेंट की, तो वो हमारी कंपनियों में इस हद तक घुस चुकी हैं कि प्रबंधन तक मैनेज कर रहीं। इस तरह भारत ने मोदी प्रशासन में आर्थिक मोर्चे पर चीन के आगे सरेंडर कर दिया।

सामरिक मोर्चे पर दूसरा सरेंडर भी मोदी के आने से खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह सब तब हुआ जब भारतीय प्रधानमंत्री चीनी राष्ट्रपति का अपने गृह राज्य में झूला झूलाकर स्वागत कर रहे थे, यानी शी जिनपिंग की यात्रा के तुरंत बाद लद्दाख के चुशूल सेक्टर में चीनी सेना ने तम्बू गाड़ दिया। यह घुसपैठ तब तक खत्म नहीं हुई, जब तक भारत ने वहां निर्माण कार्य को पूरी तरह खत्म करने का वादा नहीं किया। इस घटना से चीन समझ चुका था कि नयी मोदी सरकार भी अपीज़मेंट पॉलिसी को ही आगे बढ़ाएगी। सबसे प्रमुख उदाहरण 75 दिन तक चले डोकलाम विवाद का है, जहां भारत ने ट्राईजंक्शन में चीनी निर्माण को रुकवा देने को अपनी कूटनीतिक जीत बताया, लेकिन जैसे ही विवाद खत्म हुआ, आखिरकार चीन ने बाद के महीनों में वो निर्माण कार्य पूरा कर ही लिया, जिसकी जानकारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में भी दी थी। आत्मसमर्पण का यह दौर यहीं खत्म नहीं हुआ क्योंकि चीन के मामले में भारत सरकार की कूटनीति सबसे ज़्यादा विफल रही, जिसके उदाहरण भरे पड़े हैं। चाहे न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री ब्लॉक करने का मामला हो या मसूद अजहर को सुरक्षा परिषद से प्रतिबंधित कराने में तकनीकी अड़चन। आर्टिकल 370 हटाने के बाद सुरक्षा परिषद में जम्मू कश्मीर पर चर्चा करवाना हो या भारत की संप्रुभूता को ताक में रखकर चीन गिलगित-बाल्टिस्तान में डैम, सड़क, रेलमार्ग का निर्माण करना। चीन ने हमेशा भारत को गैर बराबरी का दर्ज़ा दिया, और अब स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स में फंसाना चाहता है, फिर भी भारत उसे हमेशा शांत रखता रहा और ऐसी घटनाओं पर प्रतिउत्तर देकर कोई भी लिवरेज़ हासिल नहीं की। इस तरह कूटनीतिक मोर्चे पर भी मोदी सरकार चीन के आगे सरेंडर हो गई।

निष्कर्ष पर जाने से पहले लद्दाख में घुसपैठ के संदर्भ में बात करें तो भारत पुनः चीन से हार चुका है। लेकिन यह सरेंडर जमीन पर कब्जे से नहीं बल्कि खुद की जमीन छोड़ने से है, यानी गालवान वैली, गोगरा पोस्ट और हॉट स्प्रिंग के पेट्रोलिंग पोस्ट 14, 15 और 17अ जैसे महत्वपूर्ण सामरिक इलाके, जो अप्रैल में भारत के कब्जे में थे, अब इनके 4 किमी के क्षेत्र में नो मैंस लैंड का अस्थायी बफर जोन बना दिया गया है। यह सब तब हुआ जब भारतीय प्रधानमंत्री चीनी राष्ट्रपति से 6 सालों में 18 बार मिलकर संबंधों को मजबूत बना चुके हैं। बेशक चीन गालवान घाटी पर कब्जा नहीं कर पाया लेकिन उसने भारत से भी इसका हक छीन लिया है। निष्कर्ष में भारत सरकार को सुझाव है कि वह चीन के संदर्भ में अपनी रक्षात्मक नीति को आक्रामकता में बदले। हालांकि पहले यह मानना होगा कि हमारी नीति फेल हुई है, जो यह सरकार मानना नहीं चाहती। दूसरी तरफ भारत को चीन की कमजोर नब्ज़ यानी दक्षिण चीन सागर, तिब्बत, ताइवान और हांगकांग पर खुलकर अपनी राय रखनी चाहिए ताकि उस पर लिवरेज हासिल की जा सके। इसके लिए चीन विरोधी देशों जैसे अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा से सहयोग बढ़ाने के साथ उनके गुटों में भी शामिल होना चाहिए, क्योंकि यह ना सिर्फ भारत के हित में है बल्कि 1962 हो या 2020 की गलती, चीन के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों का एक निर्णायक युद्ध ही भारत को अक्साई चीन, पीओके और सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता दिला सकता है साथ ही तिब्बत, हांगकांग, ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र बना सकता है। रूस की बात करें तो वह भी चीन को सहयोग नहीं देगा क्योंकि चीन के हारने से रूस ही अमेरिका का एकमात्र सुपरपावर प्रतिद्वंदी बना रहेगा और कम्युनिज्म का बादशाह भी।

21 July 2020

@Published :

3. #NavPradesh_Newspaper, 22 July 2020, Wednesday, Raipur Edition, Page 04. 👉https://www.navpradesh.com/epaper/?date_id=22-07-2020

Kumar Ramesh

Criminologist, Foreign Affairs Analyst and World Record holder

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